हंसता हुआ क्रांतिकारी
बंगाली रंगमंच में उनकी कला शोषण और दमन के विरुद्ध बिगुल थी तो वहीं हिंदी सिनेमा में अद्भुत रूप से हास्य का संचार करती थी उनकीभाव-भंगिमा। कला के इन दो विपरीत ध्रुवों को एक साथ साधने वाले उत्पल दत्त (जन्म-29 मार्च, 1939) पर संदीप भूतोड़िया का आलेख...
छ कलाकार मनोरंजन करते हैं, कुछ जागरूक करते हैं, लेकिन कुछ विरले ऐसे भी होते हैं जो क्रांति लाते हैं। उत्पल दत्त इसी श्रेणी में आते थे- अभिनेता, नाटककार, रंगमंच के दार्शनिक और शब्दों के योद्धा। बालीवुड की कामर्शियल मांग और राजनीतिक जुड़ाव वाले बंगाली रंगमंच के बीचनिर्बाध रूप से आवागमन करते हुए उत्पल दत्त ने मनोरंजन की दीवारों में सीमित होना स्वीकार नहीं किया, क्योंकि उनका मानना था कि कला परिवर्तनका उपकरण है।
कोलकाता के सेंट जेवियर्स कालेज में अध्ययन करते समय उत्पल दत्त में साहित्य के प्रति प्रेम और रंगमंच में रुचि विकसित हुई। उन्होंने 1947 में एकरंगमंच समूह बनाया, जिसे 1949 में ‘लिटिल थिएटर ग्रुप’ नाम दिया गया। इसके द्वारा उन्होंने ऐसे नाटक मंचित किए जो अंग्रेजी नाटककारशेक्सपियर और जर्मन नाटककार बर्टोल्ट ब्रेख्त से प्रभावित थे। स्वतंत्रता के बाद के भारत में रंगमंच अंग्रेजी शो और पश्चिमी नाटकीय परंपराओं तकसीमित था, इस अनुभूमि ने उन्हें बंगाली रंगमंच में डुबो दिया। उन्होंने सोचा कि वह ऐसी कहानियां लाएंगे-बनाएंगे, जिनमें अपनी मिट्टी-पसीने औरलोकजीवन की सुगंध हो। यह केवल भाषागत नहीं बल्कि समग्र विचारधारा का परिवर्तन था। अब उनके लिए रंगमंच भद्रलोक की विलासिता नहीं, बल्कि जनसाधारण के लिए जागरूकता का उपकरण था!
वे राजनीतिक चेतना को बंगाली रंगमंच के केंद्र में ले आए और इस प्रकार उत्पल दत्त एक सांस्कृतिक शक्ति बन गए। 20वीं शताब्दी के पांचवें औरछठे दशक में, उन्होंने ऐसे नाटकों को लिखने और निर्देशित करने की दिशा में बढ़ना शुरू किया जो समकालीन सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों कोदर्शाते थे। श्रमिक वर्ग के संघर्ष, दमन, क्रांति की निरंतरता-आदि विषय उनके नाटकों में प्रवाहित हुए। ‘टिनेर तलवार’ (टीन की तलवार), ‘मानुषेरअधिकार’ (मानव अधिकार) और ‘कल्लोल’ जैसे नाटकों के रूप में उन्होंने स्थापित व्यवस्था को चुनौती दी और शासकों के अन्याय को उजागर किया।उनके राजनीतिक संबंधों ने उन्हें ‘थर्ड थिएटर’ के रूप में नुक्कड़ नाटक आंदोलन की प्रेरणा दी। उन्होंने सुनहरे मंच के बजाय उनके बीच कला का प्रदर्शनकिया, जो जीवन के लिए संघर्ष कर रहे थे, यह सुनिश्चित करते हुए कि रंगमंच समाज का दर्पण, प्रतिरोध का एक हथियार बने। सत्ता ने उन्हें चुप करानेकी कोशिश की, सेंसर ने उन्हें दबाने की कोशिश की, लेकिन उत्पल दत्त कभी झुके नहीं। क्रांतिकारी नाटकों के लिए वर्ष 1965 में उन्हें प्रिवेंटिवडिटेंशन एक्ट के अंतर्गत गिरफ्तार किया गया, मगर उन्होंने धैर्य से खड़ा रहना नहीं छोड़ा।
अगर रंगमंच उनका मंदिर था, तो सिनेमा उनका साम्राज्य था। उनकी उपस्थिति चुंबकीय थी और कला अनुपम। हिंदी के पाठक इस तथ्य से कम हीअवगत होंगे कि सत्यजीत रे के साथ उन्होंने उत्कृष्ट बंगाली सिने कृतियां भी बनाईं। ‘जनअरण्य’ में उन्होंने कार्पोरेट दुनिया के भ्रष्टाचार को व्यक्त किया।‘जोय बाबा फेलूनाथ’ में उन्होंने अविस्मरणीय नकारात्मक किरदार को रचा। ‘हिरक राजार देशे’ में तानाशाह शासक के रूप में उन्होंने अनियंत्रित शक्तिको सजीव किया। बंगाली रंगमंच और सिनेमा में उनकी कला तलवार की तरह तेज धार वाली थी तो वहीं कामर्शियल हिंदी सिनेमा में वह गुदगुदातेठहाके लेकर आए। उनकी कामिक टाइमिंग बेजोड़ थी, उनके हाव-भाव दर्शकों के चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ा देते थे। कौन भूल सकता है ‘गोलमाल’ में मूंछों के शौकीन भवानी शंकर को? क्या ‘शौकीन’ और ‘रंग-बिरंगी’ में उनके अद्भुत किरदारों को भुलाया जा सकता है? लोगों को सोचने परमजबूर करना कला है, लेकिन ऐसा करते हुए उन्हें हंसाना एक दुर्लभ प्रतिभा है-वह विरला गुण जो उत्पल दत्त में प्रचुर मात्रा में विद्यमान था। चाहेउन्होंने सिनेमा में दर्शकों को हंसाया या अपने राजनीतिक मंचन से उन्हें सोचने पर मजबूर किया, उनका कार्य आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितनाउनके जीवनकाल के दौरान था। जब तक कला चुनौती देती है, जब तक रंगमंच झुकता नहीं, जब तक सिनेमा सपने देखने की हिम्मत करता है- उत्पलदत्त जीवित रहेंगे!
(लेखक संस्कृतिकर्मी हैं)
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